“रील“ की रेल ने पटरी से उतार दी ज़िंदगियाँ

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“रील“ की रेल ने पटरी से उतार दी ज़िंदगियाँ

युवाओं को निगल रहा है वर्चुअल नशा, हकीकत में उजड़ रहे हैं सपने

सवाई माधोपुर : जब 15 सेकेंड की एक वीडियो क्लिप (रील)किसी की पूरी ज़िंदगी को निगल जाए तो इसे क्या कहेगें मनोरंजन या मरण-आकर्षण। सोशल मिडिया खुद को साबित करने का मंच लेकिन यही “रील्स” अब युवाओं की ज़िंदगी को रील की तरह ही काटकर लील रही है। आज रील्स का नशा युवाओं को एक ऐसी दौड़ में धकेल रहा है जहाँ मंज़िल नहीं, सिर्फ तालियाँ और लाइक्स हैं। कोई ट्रैक पर लेटा वीडियो बना रहा है, कोई ऊंची इमारत की मुंडेर से लटक रहा है, कोई उूचें झरनों एवं पुलों से छलांग लगा रहा है तो कोई तेज रफ्तार बाइक को मौत की रेखा पर चला रहा है। सिर्फ इसलिए कि “कुछ अलग“ लगे, “कुछ वायरल“ हो। हर कुछ दिन में एक युवा की मौत की खबर आती है रील बनाते हुए हादसा, स्टंट करते समय जान चली गई, ट्रेन से टकराया, बाइक से गिरा। और पीछे रह जाते हैं सदमे में डूबे माँ-बाप, अधूरी पढ़ाई, और टूटे सपने। कहीं रील ने छीना लाल, तो कहीं जीवन की मुस्कान । ऐसे कई केस सामने आ चुके हैं जहाँ रील्स की दीवानगी ने कई माँ-बाप की गोद सूनी कर दी।

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रील की दुनिया असली नहीं है, लेकिन असर असली पड़ रहा है :- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म युवाओं को ध्यान खींचने वाले कंटेंट के ज़रिए जोड़े रखते हैं रील की दुनिया में सब कुछ फिल्टर और फेक है। लेकिन युवा इसे ही असल समझ बैठे हैं। लाइक्स और कमेंट्स की भूख इतनी बढ़ गई है कि असली रिश्तों, पढ़ाई, करियर, यहाँ तक कि ज़िंदगी से भी दूर हो रहे हैं। ये सोशल मिडिया कंपनियां अपनी ज़िम्मेदारी नहीं पा निभा रही हैं क्यों खतरनाक स्टंट्स पर कोई सख्ती नहीं साथ ही इनके द्वारा ऐसे कंटेंट को “ट्रेंडिंग“ में बढ़ावा दिया जाता है जो युवाओं में गलत ट्रेड बन रहा है।

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समस्या सिर्फ मोबाइल में नहीं, सोच में भी है :- समाज में ’शॉर्टकट सक्सेस’ का भूत सिर चढ़कर बोल रहा है। अब मेहनत से ज्यादा वायरल होना ज़रूरी हो गया है और जब लाइक्स ही आत्म-सम्मान का पैमाना बन जाएं, तो युवा आत्मा की गहराई से नहीं, कैमरे के एंगल से खुद को देखने लगता है।
रील की दुनिया, असल से बहुत दूर :- रील की दुनिया में सब कुछ फिल्टर और फेक है। लेकिन युवा इसे ही असल समझ बैठे हैं। लाइक्स और कमेंट्स की भूख इतनी बढ़ गई है कि असली रिश्तों, पढ़ाई, करियर, यहाँ तक कि ज़िंदगी से भी दूर हो रहे हैं।

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समाज, सिस्टम और समझ तीनों की ज़रूरत :- जरूरत है कि माता-पिता बच्चों के साथ संवाद करें, माता-पिता को चाहिए कि बच्चों से बात करें, सिर्फ पढ़ाई नहीं, मोबाइल पर क्या देख रहे हैं ये भी समझें। स्कूल-कॉलेज में “डिजिटल लाइफ मैनेजमेंट“ को लेकर चर्चाएं हों। स्कूल-कॉलेज इस विषय पर जागरूकता फैलाएं, और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म अपनी जिम्मेदारी समझें। ‘डिजिटल साक्षरता’ आज सिर्फ कंप्यूटर चलाने भर की बात नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन की भी बात है। सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मिलकर ऐसे कंटेंट को रोकें जो ज़िंदगी से खेलते हों। रील का नशा अगर समय रहते नहीं उतरा तो ये 15 सेकेंड की रील्स धीरे-धीरे हमारी अगली पीढ़ी को “परमानेंट साइलेंस“ में ले जाएंगी। रील्स की चमक असली ज़िंदगी का विकल्प नहीं है। लाइक्स से नहीं, लगन से मंज़िलें बनती हैं।

    लेखक
किरोड़ी सांकड़ा

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