तू चलता जा… क्रांति अपने आप बनती जाएगी – किरोड़ी सांकड़ा

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इंकलाब
तू चलता जा... क्रांति अपने आप बनती जाएगी - किरोड़ी सांकड़ा

इंकलाब की राह: तू चलता जा, काफिला बनता जाएगा
विश्वास के बीज से उपजता है इंकलाब का वृक्ष

सवाई माधोपुर: समाज में बदलाव की हर कहानी एक अकेले व्यक्ति से शुरू होती है। वह व्यक्ति जो भीड़ का इंतजार नहीं करता, न ही परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रतीक्षा करता है। वह बस चलता है, और उसकी यह यात्रा ही आंदोलन बन जाती है।

“तू चलता जा… काफिला बनता जाएगा” — यह पंक्ति केवल प्रेरणा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का वास्तविक मार्गदर्शन है। इतिहास के पन्नों में झांककर देखिए, हर इंकलाब की शुरुआत अकेली हुई। चाहे महात्मा गांधी का सत्याग्रह हो, भगत सिंह की हुंकार हो या बाबा साहब अंबेडकर की सामाजिक चेतना, ये सभी उदाहरण यही बताते हैं कि जब एक व्यक्ति चलता है, तो उसके पीछे विचारों का मेला लग जाता है।
जब सन्नाटों के बीच कोई आवाज उठती है, जब अंधेरों में कोई अकेला दीपक जलता है, और जब नाउम्मीदी के माहौल में कोई चलने का फैसला करता है वहीं से इंकलाब की राह शुरू होती है।
“तू चलता जा, काफिला बनता जाएगा। यह पंक्ति महज एक प्रेरणादायक जुमला नहीं है यह एक आंदोलन की बुनियाद है। यह उस युग को संबोधित है जहाँ बदलाव की चिंगारी बुझाई नहीं जा सकती, और जहां हर अकेला कदम एक पूरी कौम की उम्मीद बन सकता है।

चलना ही क्रांति हैं

चलना ही क्रांति हैं, जब रास्ता कठिन हो, साथी साथ छोड़ दें, और मंजिल धुंध में खो जाए, तब भी जो आगे बढ़ता है, वही इंकलाब का बीज बोता है। उसकी तन्हाई एक सोच बन जाती है, सोच विचार बनती है, और विचार आंदोलन। वो अकेला यात्री तब एक काफिला बन जाता है।
विश्वास से उपजती है क्रांति
“हमारे दिलों में विश्वास है, इंकलाब जरूर आएगा।”
यही विश्वास किसी भी बदलाव की नींव होता है। सत्ता के गलियारों में चाहे कितनी भी सख्ती हो, अगर जनता के दिलों में उम्मीद बाकी है, तो बदलाव अवश्यंभावी है। इंकलाब को रोका जा सकता है, पर मिटाया नहीं जा सकता।
हर कदम, एक दस्तक
हर कदम सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक संदेश है। यह उस जमीर को जगाने की दस्तक है, जो वर्षों से खामोश पड़ा है। जब कोई निडर होकर आगे बढ़ता है, तो डर खुद अपने घुटने टेक देता है।
चलते रहना ही इंकलाब की पहली शर्त है। तू चलता जा, अकेले, निडर, और अडिग।
एक दिन ये तन्हाई, एक संगठित शक्ति में बदल जाएगी।
क्योंकि इंकलाब —
कभी भी भीड़ से नहीं,
किसी एक के चल पड़ने से जन्म लेता है। यदि एक युवा भी यह तय कर ले कि उसे रुकना नहीं है, तो वह न केवल खुद को, बल्कि पूरे समाज को नई दिशा दे सकता है। क्रांति हमेशा भीड़ से नहीं, एक सोच से उपजती है। और जब वह सोच चल पड़ती है, तो इतिहास गढ़ देती है।
तू मत रुक… तू मत झुक… तू बस चलता चल, क्योंकि काफिला वहीं से शुरू होता है, जहां पहला कदम रखा जाता है।

लेखक: किरोड़ी सांकड़ा

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